Posted in Hindi, Poetry, Romance

Reader’s Window-003

पत्थरों से टकराकर ज़ख्मी होती है फिर भी उछलती है,

पहाड़ों से गुजरने के लिए मेहनत करती है फिर भी थिरकती है,

मिट्टी से झगडा करतेकरते मैली होती है,

फिर भी उसकी चाहत साफ़ रहती है,

सूरज से अपने तन को जलाती है,

फिर भी उम्मीद के सहारे भागती रहती है,

पेड़ो की प्यास को बुझाती रहती है,

फिर भी अपने प्यार को सूखने नहीं देती,

इतने जतन करके सागर की बाहों में खुद को खोना चाहती है,

फिर भी सागर का अपने किनारे के लिए का प्यार नदी को गहराई और अँधेरे के अलावा कुछ नहीं देता,

पर फिर भी उसका अपने सागर के लिए का जुनून हमेशा उतना ही जवान रहता है,

हाँ इसी को प्यार कहते है!

-Shraddha Jani Dave

 

shraddha-2

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