Posted in Hindi, Poetry, Romance

Reader’s Window-002

तेरे सवालों के घेरे में उलझा हूँ इस क़दर,

खुद मुझे नहीं है मालूम कि जाऊँ अब किधर।

 

सोचा था ज़िंदगी अपनी बदलकर, सँवार लूँगा अपने आने वाला कल,

एक उम्मीद थी, नए रास्ते पर चलकर पा लूँगा तुझे,

पर कारवाँ बढ़ता गया, तू मुझसे जुदा होता गया,

अब तो लाख कोशिशों के बाद भी नहीं जी पा रहा हूँ वो पल,

जब तेरे चेहरे की खुशी, मजबूर करती थी दुनिया भुलाने पर मुझे,

पर तू मुझे भूलकर आगे बढ़ गया और मैं वही पर खड़ा रह गया।

 

न जाने क्यों यह सज़ा मिली है मुझे ऐ खुदा,

एक बात है जो उनसे कहना बाकी रह गई है,

कहना है मुझे भी सिखा दो भुला देने का हुनर,

अब नहीं रोया जाता रातों को उठ-उठकर।

 

कहती रही वह आखिर तक, तुझसे अलग रहकर न जी पाऊँगी,

कुछ रही होंगी उसकी भी मजबूरियाँ, वरना

मैं इंसान को परखने में धोखा नहीं खाता।

 

न जाने गुज़ार दी कितनी रातें उनके इंतज़ार में,

पर वो न आए जिनका इंतज़ार था।

 

अभी काफिला-ए-मंजिल जारी है…

खुदा अभी तेरा इम्तहान बाकी है !

 

 तेरे सवालों के घेरे में उलझा हूँ इस क़दर,

खुद मुझे नहीं है मालूम कि जाऊँ अब किधर।

 

कोशिश जारी है,

देख लेना एक दिन पा लूँगा तुझे,

रीति-रिवाज इस जहाँ के तोड़कर दिखा दूँगा तुझे,

मजबूर है तू जिन लोगों का चेहरा आँखों में लिए,

एक दिन वही कहेंगे, इस पागल से ज़्यादा मुहब्बत कौन करेगा तुझे ?

nitin

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