Posted in Hindi, Poetry, Romance

Reader’s Window – 001

कल शाम को एक गर्म cup coffee का..

और थोड़ी सी थकान।

इतना लेकर बैठी gallery में..

जब आई मेरे चेहरे पर मुस्कान।

हवाओं ने छेड़ा उन खुली जुल्फों को..

और याद दिला गयी वो उन दिनों को।

जब एक सपना था..

और पास था वो जिसे समझा अपना था।

नहीं लिखूंगी एक भी ऐसा सोचा मैंने..

भुला दे उन यादों को ऐसा खुद को याद दिलाया मैंने।

पर फिर याद आया वह एहसास..

जब उनके हाथ छेड़ते थे यही जुल्फों को और महक जाती थी मेरी सांस।

हाँ एक टूटा सपना था वह..

जब बावरी हुई बैठी थी मैं यह सोचकर की अपना था वह।

 

आ ही गई आखिर वापस पगली..

ऐसा न समझना।

यह तो था एक एहसास..

जो तुझे शब्द में भेजकर मुझको बयान करना पड़ा।

 

बाकी खुश है तू अपनी रंगीन दुनिया में यह पता है मुझे..

इसीलिए मुझे सताती है, पर छूती भी नहीं ये हवाएँ और वे यादें तुझे।

 

– Shraddha Jani Dave

 

 

SHRADDHA 1.jpg

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